Tuesday, 14 July 2015

'बाहुबली' के पीछे की कहानी: कछुए की खाल के हथियार, मशीनी जानवर


राजामौली ने इस फिल्म के निर्माण में कड़ी मेहनत की है, जो इसे देखने के बाद सिद्ध होती है। बता दें कि फिल्म की कहानी 2500 साल पहले एक एक काल्पनिक राज्य माहेष्मती की है। इसका सेट निआग्रा फॉल्स ऑफ इंडिया के नाम से पॉपुलर केरल के टूरिस्ट स्पॉट अथिरापल्ली फॉल्स का है, जिसे साउथ फिल्म सिटी में तैयार किया गया था। फिल्म में वॉर एक्सेसरीज के रूप में कछुए की खाल का इस्तेमाल किया गया। जो जानवर इसमें दिखाए गए, वे सभी मशीन द्वारा तैयार किए गए हैं।
फिल्म के आर्ट डायरेक्टर साबू सायरिल ने dainikbhaskar.com से खास बातचीत के दौरान फिल्म से जुड़ी ऐसी ही कुछ बातें शेयर कीं। वे बताते हैं कि फिल्म के सिलसिले में राजामौली से उनकी पहली मुलाकात बांद्रा, मुंबई के होटल ताज लैंड एंड में हुई थी। वे कहते हैं, "यह प्रोजेक्ट एक बहुत बड़ा टास्क था, लेकिन चैलेंज लेना किसे पसंद नहीं है। 2012 में मैंने इस फिल्म को साइन कर लिया और 2013 से काम शुरू कर दिया। 380 दिन में फिल्म की शूटिंग पूरी हुई।" साबू सायरिल ने और क्या-क्या कहा जानते हैं:

2500 साल पुराने राज्य का निर्माण

राजामौली के अनुसार, उन्हें 2500 साल पुराना राज्य तैयार करवाना था। साबू बताते हैं, "जब उन्होंने यह मांग की तो सबसे पहले दिमाग में रोम का नाम आया, लेकिन राज्य में भारतीयता चाहिए थी। तब अजंता एलोरा की गुफाओं का ध्यान आया और एक काल्पनिक राज्य को बनाना शुरू कर दिया।

मशीनी जानवरों का निर्माण

बाहुबली एक पीरियड फिल्म है। ऐसे में एक्शन सीन्स में घोड़े, हाथी जैसे जानवरो का शामिल करना लाजिमी था। सायरिल के मुताबिक ‘हम वॉर सीक्वेंस में जानवरों को गिरते और घायल होते हुए दिखाना चाहते थे, जो असली जानवरों के साथ मुमकिन नहीं था। इसलिए हमने हाथी, घोड़े, जंगली भालुओं, घड़ियाल और एक बड़े सांप को मेकैनिकल मॉडल्स के जरिए रिप्लेस किया।

वॉर सीक्वेंस के लिए कछुए और पेड़ों की छाल का इस्तेमाल

किसी भी वॉर सीक्वेंस, खासकर पीरियड फिल्म के लिए ऐसे कॉस्टयूम्स बनाना सबसे बड़ा चैलेंज होता है, जो कम वजनी और आरामदायक हो। हालांकि, फिल्म के आर्ट डायरेक्टर सायरिल ऐसा करने में कामयाब रहे। वे बताते हैं, ‘फाइट सीन्स के लिए, हमने ऐसी तलवारों और ढालों का इस्तेमाल किया जो कार्बन फाइबर से बनी थीं। यह वही मटेरियल है, जो हेलिकॉप्टर ब्लेड्स के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
इस मटेरियल के यूज से फिल्म के एक्टर्स को एक्शन सीन्स करने में आसानी हुई, क्योंकि यह कम वजनी थी। फिल्म का एक और अट्रैक्शन प्वाइंट है विलेन कालकेय का कॉस्टयूम, जिसे कबीलाई दिखाया गया है। तलवारों और कवचों को बनाने के लिए कछुए की छाल और लकड़ी का इस्तेमाल किया गया, ताकि उनका लुक ज्यादा से ज्यादा ऑथेंटिक लगे।

100 फीट ऊंची मूर्ति (स्टेच्यू)

फिल्म के प्रोमों में एक बहुत बड़ा स्टैच्यू दिखाया गया है। ज्यादातर लोगों को ये मालूम नहीं होगा की ये स्टैच्यू 100 फीट लंबा है, जिसे बनाने के लिये फिल्म की टीम ने पहले इसका एक छोटा 3D वर्जन बनाया और जब ये फाइनल हो गया, तब इसकी 100 फीट ऊंची बिल्डिंग जैसी रेप्लिका तैयार की गई। इस विशालकाय स्ट्रक्चर को बनाने के लिए 200 मजदूरों ने करीब एक महीने तक काम किया। फाइबर से बने इस स्ट्रक्चर का निर्माण करने में 3 इंडस्ट्रियल क्रेंस का इस्तेमाल भी किया गया।

अथिरापल्ली फॉल का पुनर्निर्माण

प्रोमो में पीछे दूधिया वाटरफॉल दिखाई दे रहा है। फिल्म के कई महत्वपूर्ण सीन इस वाटरफॉल के साथ शूट किए गए हैं। इसको लेकर राजामौली का नजरिया बिल्कुल साफ था। उन्होंने मुझे फोटोशॉप पर इसके लिए कुछ स्केचेस दिखाए थे, ताकि मैं इसे समझ सकूं। सीरियली, उनकी थॉट में कई ख्वाब बसे हुए थे, जिन्हें हकीकत का रूप देना मेरी जिम्मेदारी थी। कुछ सीन ही हमने अथिरापल्ली वॉटरफॉल, केरल में शूट किए। कहा जाता है कि यह भारत का सबसे बड़ा वाटरफॉल है। चूंकि, एक्शन सीक्वेंस रियल लोकेशन पर शूट करना खतरे से भरा था, इसलिए साउथ फिल्म सिटी में इस वाटरफॉल को रीक्रिएट करना पड़ा। इसे रियल दिखाने के लिए पाइप्स के जरिए ढेर सारा पानी छोड़ा गया। वहां पानी था, लेकिन ज्यादा नहीं था। हमने मोटर सिस्टम के जरिए इसे पहले टॉप पर पहुंचाया, फिर उसे वहां से गिराया। यह प्रोसेस कई बार दोहराई गई। संभवतः इस तरह की टेक्निक किसी फिल्म में पहली बार इस्तेमाल की गई है।

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