ईद-उल-फि़त्र का त्योहार हमें समाज के साथ बेहतर संबंध रखने और सभी के साथ खुशियां बांटने की शिक्षा देता है। इस अवसर पर शकील हसन शम्सी का आलेख..
इस्लाम अपने मानने वालों से चाहता है कि वे दिन में पांच बार मस्जिद जाएं, ताकि उनकी अपने आसपास के लोगों से मुलाकात हो, शुक्रवार को एक बड़ी मस्जिद में नमाज़ पढ़ें, ताकि उनकी कई मुहल्लों के लोगों से मुलाक़ात हो और ईद की नमाज़ ऐसी जगह पढ़ी जाए, जहां शहर के अधिकांश लोग जमा हो सकें। इसी उद्देश्य से पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद ईद की नमाज मदीना शहर से कुछ दूर एक खाली मैदान में पढ़ा करते थे, उनके साथ नमाज़ में शामिल होने के लिए पूरे शहर से लोग उमड़ पड़ते थे। पैग़ंबर साहब के बाद यह सिलसिला सहाबा (पैग़ंबर के साथियों) के दौर में भी चलता रहा। जब मुसलमान भारत में आबाद हुए तो यहां भी उन्होंने नगर से दूर खुले मैदान में ईद की नमाज पढ़ने का सिलसिला क़ायम किया, बाद में कई अमीरों और जमींदारों ने ईद की नमाज़ के लिए बड़े मैदानों में चारदीवारी उठाकर ईदगाहें बनवाई। ख़ास बात यह कि इन ईदगाहों में साल भर नहीं, बल्कि सिर्फ ईद-उल-फि़त्र और ईद-उल-अज़हा में ही नमाज़ होती है।
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भारतीय उप-महाद्वीप के अलावा ईदगाहें कहीं नहीं है। यह गर्व भारत को ही प्राप्त है कि ईदगाहों की बुनियाद यहीं पड़ी। भारत के विभिन्न शहरों, कस्बों और गांवों में ईदगाहों में लोगों की भारी भीड़ होती है। ईदगाह के आसपास बड़े मेले भी लगते हैं, जिनका चित्रण मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कहानी ईदगाह में दिल छू लेने वाले अंदाज़ में किया है। वैसे तो सभी शहरों की दर्जनों छोटी बड़ी मसजदों में ईद की नमाज होती है, लेकिन ईदगाह में नमाज पढ़ने का जो आनंद है, उसका वर्णन संभव नहीं है।
ईद का अर्थ ही है खुशी या प्रसन्नता। रमजान के रोजे पूरे होने की खुशी को हम लोगों से बांटते हैं। लोगों से मिलना-जुलना किसी भी व्यक्ति को सामाजिक और सौहार्दपूर्ण बनाता है। इससे हमारे बीच भाईचारा पैदा होता है। ईद का उद्देश्य भी लोगों से मिल-जुलकर खुशियां बांटना है। ईद का एक मानवीय पहलू यह भी है इस मौके पर लोग अपने परिवार के हर सदस्य के नाम से फि़त्रा (दान की एक निर्धारित रकम) जरूर निकालते हैं, जो गरीबों में बांटी जाती है। सुन्नी समुदाय में यह रकम 45 रुपये प्रतिव्यक्ति के हिसाब के हिसाब से दान में दी जाती है, जबकि शिया वर्ग के लोग 3 किलो अनाज प्रतिव्यक्ति दान में देते हैं।
जिस तरह ईदगाह और ईद का मेला भारतीय मुसलमानों की तहज़ीब का एक हिस्सा बन गया है, उसी तरह ईद में सेवई पकाने की रस्म भी भारतीय उप महाद्वीप के मुसलमानों से इस तरह जुड़ गई है कि अगर ईद के दिन किसी घर में सेवइयां न पकें तो लोग अपशगुन समझते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि मुस्लिम देशों के लोगों को सेवईं के बारे में पता तक नहीं है, लेकिन भारतीय मुसलमान सेवई के बिना ईद मनाने को सूखी ईद का नाम देते हैं। अरब देशों में बसे भारतीय लोग ईद मनाने के लिए विशेष रूप से भारत से सेवइयां मंगाते हैं। वैसे अब वहां कुछ भारतीयों और पाकिस्तानियों की दुकानों पर सेवइयां बिकने भी लगी हैं।सबसे मुबारक महीना होता है रमजान


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